यहां पर आज भी मौजूद है मां काली के पदचिह्न

यहां पर आज भी मौजूद है मां काली के पदचिह्न

देवभूमि उत्तराखंड का ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से देेेश ही नही अपितु पूरे सम्पूर्ण विश्व में अत्यधिक महत्व रहा है। त्रिकालदर्शी महर्षि वेदव्यास ने तपस्या के लिए इसी पावन भूमि को चुना और व्यास गुफा में आसन लगाकर अठारह पुराणों की रचना की। पाण्डवों ने भी राज्य वैभव को भोगने के बाद आत्मिक शांति पाने के लिए उत्तराखंड के भू भाग को चुना। हिमालय के दिव्य वैभव, हिममण्डित गगन चुम्बी चोटियाँ, सदानीरा पवित्र नदियाँ, कल – कल बहते निर्झर, वनों की विपुल प्राकृतिक सम्पदा और सौन्दर्य हर किसी को भा जाता है। देवभूमि उत्तराखंड में कालीमठ घाटी युगों से महान साधकों की तपस्थली रही है, क्योंकि इस घाटी के कण – कण में ईश्वरीय शक्ति विध्यमान है। यहां पर कई मंदिर है जो कि भक्तों के आस्था के अटूट केंद्र है। ऐसा ही एक मन्दिर है रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है जिसे सिद्धपीठ कालीमठ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी और मां काली ने इस स्थान पर 12 साल की बालिका के रूप में जन्म लिया था HOMEयहां पर आज भी मौजूद है मां काली के पदचिह्नधर्म-कर्मयहां पर आज भी मौजूद है मां काली के पदचिह्न 6 hours ago newsadminदेहरादून।देवभूमि उत्तराखंड का ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से देेेश ही नही अपितु पूरे सम्पूर्ण विश्व में अत्यधिक महत्व रहा है। त्रिकालदर्शी महर्षि वेदव्यास ने तपस्या के लिए इसी पावन भूमि को चुना और व्यास गुफा में आसन लगाकर अठारह पुराणों की रचना की। पाण्डवों ने भी राज्य वैभव को भोगने के बाद आत्मिक शांति पाने के लिए उत्तराखंड के भू भाग को चुना। हिमालय के दिव्य वैभव, हिममण्डित गगन चुम्बी चोटियाँ, सदानीरा पवित्र नदियाँ, कल – कल बहते निर्झर, वनों की विपुल प्राकृतिक सम्पदा और सौन्दर्य हर किसी को भा जाता है। देवभूमि उत्तराखंड में कालीमठ घाटी युगों से महान साधकों की तपस्थली रही है, क्योंकि इस घाटी के कण – कण में ईश्वरीय शक्ति विध्यमान है। यहां पर कई मंदिर है जो कि भक्तों के आस्था के अटूट केंद्र है। ऐसा ही एक मन्दिर है रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है जिसे सिद्धपीठ कालीमठ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी और मां काली ने इस स्थान पर 12 साल की बालिका के रूप में जन्म लिया था। देवी, देवताओं से असुरों के आतंक के बारे में सुनकर मां का शरीर क्रोध से काला पड़ गया था और उन्होंने विकराल रूप धारण कर युद्ध में दोनों दैत्यों का संहार करा था। कालीमठ मंदिर के समीप मां ने रक्तबीज का वध किया था । उसका रक्त जमीन पर न पड़े, इसलिए महाकाली ने मुंह फैलाकर उसके रक्त को चाटना शुरू किया था। रक्तबीज शिला आज भी अलकनन्दा नदी के किनारे स्थित है। इस शिला पर माता ने रक्तबीज का सिर रखा था। यहां पर आज भी मां काली के पैरों के निशान मौजूद है। इस मंदिर से आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक दिव्य शिला है। इस शीला को कालीशिला के नाम से जाना जाता है। कालीशिला में देवी-देवता के 64 यंत्र हैं। कहते हैं इन्हीं यंत्रों से मां दुर्गा को दैत्यों का संहार करने की शक्ति मिली थी। कहा जाता है कि कालिदास का साधना स्थल भी यही रहा है। इसी दिव्य स्थान पर कालिदास ने मां काली को प्रसन्न कर विद्वता को प्राप्त किया था। इसके बाद काली के आशीर्वाद से ही उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। कालीमठ

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